ऑल इण्डिया मुस्लिम मजलिस की स्थापन

ऑल इण्डिया मुस्लिम मजलिस के सम्बन्ध में अवगत कराना चाहता हूँ कि 09/08/1968 को मुस्लिम मजलिसे मशावरक का गठन हुआ जिसमें डॉक्टर अब्दुल जलील फरीदी की मुख्य भूमिका थी चौधरी चरण सिंह जी ने वर्ष 1967 में काग्रेस छोड़कर सोसलिस्ट पार्टी जनसंघ व वामपंथी नेताओं से मिलकर संयुक्त विधायक दल का गठन दिया गया था ।

उस समय मुस्लिम मजलिसे मशावरक की ओर से डॉक्टर अब्दुल जलील फरीदी साहब ने चौधरी चरण सिंह जी को मुख्यमंत्री बनाने में अहम भूमिका निभाई थी फिर 03/06/1988 को ऑल इण्डिया मुस्लिम मजलिस का गठन किया गया और वर्ष 1969 के चुनाव में मुस्लिम मजलिस ने तीन विधायक जितायें सन् 1974 के चुनाव अब्दुल जलील फरीदी साहब, चौधरी चरण सिंह जी एवं राज नारायण जी ने मिलकर त्रिगुट मौर्चे का गठन किया और सन् 1974 के चुनाव में भाग लिया और उस समय मुस्लिम मजलिस के प्रभाव को रोकने के लिए कांग्रेस ने केरल से मुस्लिम लीग को उ०प्र० के चुनाव में उतार दिया जिससे मुस्लिम मजलिस को राजनैतिक रूप से काफी नुकसान हुआ ।

26/06/1975 को देश में आपातकाल घोषित हो गया और मुस्लिम मजलिस के कार्यकर्ता जेल चले गये सन् 1977 के चुनाव में चौधरी चरण सिंह जी मुस्लिम मजलिस को लोक सभा की दो सीटे छोड़ी जिसमें फतेहपुर से वसीर अहमद व सुल्तानपुर जुल्फिकार उल्ला साहब जब उस समय पार्टी अध्यक्ष का चुनाव लड़ा और जीते और उनको चौधरी चरण सिंह साहब ने केन्द्रीय मंत्रालय में भागीदारी दी संचार मंत्री व वित्तमंत्री जैसे पदो को साथ काम करने का मौका मिला सन् 1979 के चुनाव में मुस्लिम मजलिस ने अलग चुनाव लड़ा। 1985 व 1988 के चुनाव में फजरूलवारी विधायक रहे सन् 1989 के चुनाव में मुस्लिम मजलिस ने जनता दल के बैनर तले चुनाव लडा इस प्रकार मुस्लिम मजलिस सामाजिक व आर्थिक रूप से मुद्दे उठाती और लड़ती रही है और मुसलमानों के एक वर्ग को आज भी प्रभावित करती है।

ऑल इण्डिया मुस्लिम मजलिस का कयाम और तहरीकात:

तकसीम मुल्क के बाद ना सिर्फ मुसलमानो को फसाद के नाम पर जानी माली नुवसनात का सिलसिला शुरू हो गया, वह ताकत जो अंग्रेजो से मुल्क को आज़ाद कराने के इसलिए खिलाफ थी कि उनका सोचना था, कि आजादी मिलने पर कही मुसलमान फिर हुक्मरान न हो जाए इसलिए वह मुस्लिम दुश्मन ताकते अंग्रेजो की मुखबरी कर रहे थे, लेकिन मुल्क जब दो हिस्सो में बट कर आजाद हुआ, तो आर०एस०एस० महासभा जैसी तन्जीम जिसकी पुश्त पनाही करने वाले कुछ कद्दावर लीडर कांग्रेस में भी मौजूद रहे। एक साजिश के तहत मुसलमानो को दहशत जदा करने के मक्सद से तक्सीगे मुल्क का जिम्मेदार मुसलमानो को ठहराने लगे और फसाद के जरिये मुल्क मे उनका अरसा-ए-हयात तंग कर दिया गया। मुसलमान खौफ में इस तरह मुब्तिला हुआ कि वह अपने मसाईल के हल की बात करने की हिम्मत खो बैठा और मुल्क की तकसीम कि मुसलमान जिम्मेदारी कबूल करने लगे और मुसलमानो ने जिम्मेदारी कुबूल कर दिया और कांग्रेस को अपना मुहाफिज़ समझकर उसका वोट बैंक बन बैठा, लेकिन कांग्रेस कभी भी ईमानदारी से मुसलमानो की जान माल इज्जत आवरू को लूटने वाले अनासिर के खिलाफ कोई मुअस्सर कार्यवाही नहीं की। पूरे मुल्क में मुसलमानो की आवाज कोई उठाने वाला नही रहा । खासतौर से उत्तरी भारत मे मुसलमान बदतरीन हालात से गुजर रहा था। पूरे मुल्क मे फसाद के नाम पर जबरो जुल्म का पहाड़ तोड़ा जा रहा था। इन हालात से मुकाबला करने के लिए मुल्क के मज़हबी सियासी रहनुमा और दानिशवारा ने मिल्लत ने 9 अगस्त 1964 मे गैर सियासी तंज़ीम ऑल इण्डिया मुस्लिम मजलिस मशावरत कायम की जिसके वानियान में मिल्लत खा० अब्दुल जलीस फरीदी भी शामिल रहे और उन्हें रियासत उत्तर प्रदेश का मुशावरत का सदर बनाया गया।

मशावरत के जिम्मेदारान ने मुल्वगीर पैमाने पर दौरा करके जहाँ मुसलमानो के दिल से अहसास कमतरी को निकालने की कोशिश की और यह भी ऐलान किया कि जो जमाअत मुसलमानो के मसाइल को हल करने के लिए आवाम मे आवाज उठाने का यकीन दिलाएगी उसको वोट देने की मुसलमानों से अपील की जाए और मशावरत ने एक 9 नुकाती मन्शूर जारी किया, जिसको कांग्रेस के अलावा कई जमाअत ने तस्लीम किया, लेकिन इलेक्शन में कामयाब होने के बाद मशावरत के मन्शूर को रद्दी की टोकरी मे डाल दिया। मशावरत के इस तजुर्बे के नाकाम होने पर कायदे मिल्लत डा० फरीदी साहब जिनकी आला सोच रही है। मसाइल सियासी ताकत के बगैर हल नहीं हो सकते, ने अपने हम असर अहले हजरात से मशवरा करने के बाद 3 जून 1968 को ना सिर्फ मुस्लिम सियासी जमाअत की तशकील किया बल्कि उसका नाम ऑल इण्डिया मुस्लिम मजलिस रक्खा ताकी मुसलमानो के दिल से खौफ निकल सके। हालांकि मुल्क खास तौर से उत्तर प्रदेश की बदतरीन सूरते हाल जिसमे मुसलमानो का अपनी शनाख्त के साथ बाहर निकलना मुश्किल हो गया। इसमे मुस्लिम सियासी जमाअत की तशकील और उसका मुस्लिम नाम रखना बहुत जिगर का काम था। यह वक्त था, जब मुसलमान अपनी शनाख्त खौफ की वजह से छुपाने लगा।+ए उस वक्त के अकावरीन ने तहफ्फुज मुस्लिम जोड़कर कौम को यह पैगाम देने की कोशिश की मुसलमान अपनी शनाख्त के साथ अदलो इन्साफ पर मवनी सियासत करके मुसलमानो मे एहसासे कमतरी दूर की जाये। बताते चले की डा० फरीदी साहब सोरिलस्ट पार्टी बाद मे प्रजा सोशिलस्ट पार्टी के ना सिर्फ कद्दावर लीडर थे, बल्कि 12 साल कानून साज असंबली के मेम्बर (एम0एल0 सी0) और लीडर हस्ब इख्तेलाफ भी रहे। लेकिन विधान परिषद में उर्दू के तहत कार्यवाही का कोई इंतेजाम फरीदी साहब की पूरजोर कोशिश के बाद भी नहीं किया गया, तो फरीदी साहब ने अपने ओहदे और एम०एल०सी० से इस्तीफा दे दिया था।

उसके बाद कभी भी कोई इलेक्शन नही लड़ा और पूरी जिन्दगी उर्दू की तहरीक अलीगढ़ तहरीक व दीगर मुस्लिम मसाइल के हल के लिए कोशां रहे। डा० फरीदी साहब आला शख्सियत मे उनका शुमार था जिन्दगी के हर ऐशो इशरत के मालिक थे उस जमाने में ए०सी० मे रहने वाले मर्द मुजाहिद ने इसके अलावा वजाहिर उलमाये इकराम ने भी उनकी मुखालफत तो नही की, लेकिन बाजे तौर पर डाक्टर साहब की हिमायत भी नहीं की कौम के मुस्तक्विल कि खातिर अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया। यहाँ तक की उन्हे गर्द गुबार वगैराह से साँस की बेहद तकलीफ हो जाती थी। फिर भी उन्होने पूरी रियासत को पैगाम दिया कि मसाईल चापलूसी व खुशामद से हल नहीं होता। मसायल हल के लिए सियासी ताकत जरूरी है। ऑल इण्डिया मुस्लिम मजलिस के कयाम 3 जून 1968 मे होने के फौरन बाद 1969 में रियासती असम्बली का इलेक्शन हुआ। जिसमे मुस्लिम मजलिस के 3 मेम्बरान कामयाब हुए। 1971 में पार्लियामेंट के इलेक्शन से कबल कांग्रेस दो हिस्सो मे बट गयी। कांग्रेस से तकरीबन सभी सीनियर लीडरान अलग हो गये और इन्द्रा गाँधी अकेली पड़ गयी और इलेक्शन मे इन्द्रा गाँधी जी ने डा० फरीदी साहब से मदद की अपील को डा० फरीदी साहब ने उनके सामने मुसलमाने के मसायल के हल करने की तजवीज रखी। जिसे इन्द्रा गाँधी जी ने बिना चुचरा के मान लिया तो डा० फरीदी साहब ने इन्द्रा गाँधी जी की हिमायत का ऐलान किया और कांग्रेस के समझौते से कुछ सीटो पर मजलिस के उम्मीदवार उतारे। अलबत्ता इन्द्रा गाँधी जी हूकुमत साजी मे कामयाब रहीं । इन्द्रा गाँधी जी अपनी इस कामयाबी से तानाशाही की तरफ बढ़ने लगी और डा० फरीदी साहब से किये गये वायदो पर अमल नही किया गया। जिसका डा० फरीदी साहब को बहुत अफसोस हुआ और उन्होने उ०प्र० में कांग्रेस को उखाड़ फेकने का फैसला कर लिया और 1974 मे मुल्क मे पहली इत्तेहादी सियासत का आगाज कायदे मिल्लत डा० फरीदी साहब ने मुस्लिम मजलिस, लोकदल और सोशलिस्ट पार्टियों का इत्तेहाद सलासा के नाम से मोर्चा बना कर जिसकी अवामी मकबूलियत देख कर इन्द्रा गाँधी को काफी तशबीश हुई और रियासत की हुकूमत जाती नजर आने लगी तो केरल की अपनी इत्तेहादी जमाअत मुस्लिम लीग को उत्तर प्रदेश में जिन 40 सीटो पर मुस्लिम मजलिस के उम्मीदवार मैदान में थे।

उन्ही पर लीग का उम्मीदवार खड़े करा दिये और लीग के जरिये पूरे इलेक्शन को हिन्दू मुस्लिम बना दिया। नतीजे के तौर पर जहाँ मजलिस के सिर्फ 4 उम्मीदवार ही कामयाब हो सके। वही पर लोकदल और सोशलिस्ट पार्टी को भी काफी नुकसान हुआ और कांग्रेस हुकूमत साजिश में फिर कामयाब हो गयी । कायदे मिल्लत डा० फरीदी साहब जो काफी बीमार चल रहे थे, उन्हे लीग के इस इकदाम का काफी अफसोस हुआ और इस सदमे से बाहर नही निकल सके और 19 मई 1974 को उनकी बफ़ात हो गई । उ0प्र0 में कांग्रेस फतह के बाद और इन्द्रा गाँधी जी रूकून मेम्बरी पार्लियामेन्ट हाईकोर्ट इलाहाबाद से कल अदब करार पाने के बाद इन्द्रा जी ने 25 जून 1975 इमरजेंसी नाफिज़ करके मुखालिफ जमाअतो के लीडरान को जेल की सलाखो में कैद कर दिया। जिसमें मुस्लिम मजलिस के लीडरान भी शामिल रहे। वाजय हो कि इमरजेन्सी के निफाज से केवल कांग्रेस हुकूमत के खिलाफ जय प्रकाश नारायण की क्यादत मे तहरीक शुरू हो चुकी थी, जिसको नाकाम बनाने के लिए इन्द्रा गाँधी जी ने इस तहरीक को आर०एस०एस० तहरीक पर प्राचारत करने लगी तो जय प्रकाश नारायण काफी परेशान हुए तो इसी दरम्यान मुस्लिम मजलिस की कान्फ्रेंस जो रिफाह आम क्लब लखनऊ मे मुनकिद हुई, मे जय प्रकाश मूवमेंट की हिमायत का ऐलान कर दिया गया। जिससे इन्द्रा गाँधी जी अपने नापाक मनसूबे मे कामयाब न हो सकी और जय प्रकाश नारायन जी ने मुस्लिम मजलिस का शुक्रिया अदा करते हुए ब्यान दिया था कि मजलिस ने इस कांग्रेस मुखालिफ तहरीक को नाकाम होने से बचा लिया है। पूरे मुल्क को मुस्लिम मजलिस का एहसान मंद होना चाहिए क्योंकि डा० फरीदी साहब ने जमाअत का नाम मुस्लिम जरूर रखा था, लेकिन अमली तौर पर दलित, पिछड़े तबके के लीडरान को साथ लेकर हर तहरीर चलायी थी । जिसकी बिना पर मुल्क की कोई जमाअत हत्ता की जनसंघ तक मजलिस पर फिरका परस्त जमाअत होने का इल्जाम लगाने की हिम्मत नही हो सकी। मरहूम डा० फरीदी साहब के बाद भी मजलिस के जिम्मेदारान उसी फारमूला पर अमल करते चले आ रहे है।