पार्टी का इतिहास
कांग्रेस के मुकाबले मे जनता पार्टी का वजूद में आना:
कांग्रेस के मुकाबले मे जनता पार्टी का वजूद में आना- इमरजेन्सी के खात्मे के ऐलान से कब्ल जेल में जे०पी० की क्यादत में जनता पार्टी का जन्म हो चुका था। जेल से रिहा होने के बाद लोकदल, सोशलिस्ट पार्टी, बहुगुणा जी व जगजीवन राम की पार्टी, जन संघ वगैराह ने जनता पार्टी मे अपनी पार्टियों को जम कर दिया था। लेकिन मुस्लिम मजलिस ने अपनी अलहदा शनाख्त कायम रखते हुए जनता पार्टी की इत्तेहादी पार्टी की हैसियत से 1977 के इलेक्शन में सिर्फ दो उम्मीदवार कौमी सदर हाजी जुल्फिकार उल्लाह को सुल्तानपुर व बशीर अहमद एड० को फतेहपुर से उम्मीदवार बनाया था और दोनो हजरात कामयाब हुए। हाजी जुल्फिकार उल्लाह साहब मर्कजी हुकूमत मे बजीर खजाना बनाए गये थे। पार्लियामेन्ट के इलेक्शन के 3 माह बाद हुएं असेम्बली इलेक्शन में जनता पार्टी ने मुस्लिम मजलिस को 10 सीट दी थी। कौमी सदर जुल्फिकार उल्लाह साहब व रियासती सदर हबीव अहमद साहब की क्यादत मे 10 सीटो मे से 8 सीट पर आजमगढ़, बनारस, गाजीपुर, इलाहाबाद, गोंडा, टांडा के साथ बाराबंकी से नन्हेलाल, कुरील, शाहगंज से छोटेलाल निमर्य कामयाब हुए। दो उम्मीदवार सय्यद अमजद अहमद साहब तिलोई जिला - राय बरेली और रामपुर से मो० आजम खाँ कामयाब नही हो सके थे। इस तरह पार्लियामेन्ट मे 100 फीसद और असेम्बली मे 80 फीसदी मजलिस का रिजल्ट रहा। रियासत की राम नरेश यादव सरकार व बाद मे बनारसी दास सरकार ने पार्टी के सीनियर लीडर मौलाना मसूद खॉन एड० P. W.D वजीर रहे। सन् 1980 में जनता पार्टी मे जन संघ के लोगो खास तौर से अटल बिहारी बाजपेयी व आडवाणी के दोहरी मेम्बर शिप यानी जनता पार्टी व आर०एस०एस० मेम्बरी को लेकर चरण सिंह जी बगावत करके कांग्रेस की हिमायत से वजीर आजम बन गये और जनता पार्टी की मोरार जी देसाई की हुकूमत गिर गई, लेकिन चरण सिंह जी पार्लियामेन्ट का सामना नही कर सके और उनकी भी हुकूमत गिर गई।
चरण सिंह की हुकूमत में भी हाजी जुल्फिकार उल्लाह साहब वजीर रहे। चरण सिंह जी ने फिर से अपनी पार्टी लोकदल को जिन्दा किया और 1980 के पार्लियामेन्ट इलेक्शन मे चौधरी चरण सिंह जी ने मुस्लिम मजलिस को साथ लेकर चलने की बहुत कोशिश की, लेकिन मुशावरत के फैसले की बुनियाद पर मुस्लिम मजलिस ने जनता पार्टी का साथ दिया, मजलिस का पार्लियामेन्ट उम्मीदवार मे से कोई कामयाब नही हो सका। अलबत्ता चारो उम्मीदवार दूसरे नम्बर पर रहे और फिर इन्द्रा गाँधी जी भी अकसरियत से हुकूमत साजी मे कामयाब हो गई और इस तरह तीन साल मे जनता पार्टी बिखर गई। 1984 पार्लियामेन्ट इलेक्शन मे मुस्लिम मजलिस के रियासती सदर फजल उल वारी साहब बलरामपुर जिला-गोडा से मुस्लिम मजलिस के उम्मीदवार हुए। लेकिन मामूली वोटो से हार गए। इसी के फौरन बाद सूवाई असम्बली इलेक्शन मे मुस्लिम मजलिस से फजल उल वारी साहब अतरौला से एम०एल०ए० हुए और तुलसीपुर मुस्लिम मजलिस के उम्मीदवार अब्दुल वहाब साहब मरहूम व गेस्टी से मस्लिम मजलिस के युवा तुर्क काजी नफीसुल हसन अब्बासी एड० कामयाब नही हो सके थे। 1989 के कब्ल विश्व नाथ प्रताप सिंह जी के कांग्रेस मुखालिफ मूवमेन्ट से जनता दल वजूद मे आया तो मुस्लिम मजलिस ने जनता दल की हिमायत की और चार असेम्बली जनता दल ने मुस्लिम मजलिस के कोटे मे दी थी। लेकिन मुस्लिम मजलिस का कोई भी उम्मीदवार कामयाब नही हो सका। उस वक्त के पार्टी के रियासती सदर मरहूम कमर आलम काजमी साहब असेम्बली व फजल उल वारी साहब गोडा से पार्लियामेन्ट की सीट पर बहुत कम वोटो से हार गए थे। 1991 मे रियासती सदर कमर काजमी व कौमी सदर हाजी जुल्फिकार उल्लाह साहब की क्यादत मे मुस्लिम मजलिस ने इलेक्शन मे हिस्सा लिया था। कोई उम्मीदवार कामयाब नही हो सका था। 1993 के असेम्बली इलेक्शन जो मुलायम सिंह व काशीराम ने मिलकर लड़ा था। मुस्लिम मजलिस ने यह कहकर बाईकाट कर दिया कि जिस इलेक्शन निजाम मे हमारी सैकड़ो साला कदीम बाबरी मस्जिद शहीद कर दी गई, उसका बाईकाट करने की मुसलमानो से अपील करते है। लेकिन इस तारीखी फैसले की मुसलमानो के सियासी रहनुमा व दानिशवराने मिल्लत ने जबरदस्त मुखालफत की। हांलाकि बाद मे बहुत से शख्यियत ने इस फैसला को हक जानिब बताया, तब तक इलेक्शन हो चुका था। 1996 के पार्लियामेन्ट के इलेक्शन मे कम काजमी साहब की कयादत मे मुस्लिम मजलिस ने 4-5 सीटो पर कांग्रेस के इत्तेहाद पर उम्मीदवार उतारे जिसमे 2 मौजूदा रियासती सदर जनाब नदीम सिद्दीकी एड0 भी शामिल थे। लेकिन कोई उम्मीदवार कामयाब नही हुआ। 1996 में हुए असेम्बली के इलेक्शन मे भी कोई उम्मीदवार कामयाब नही हुआ। 1998 मे मरहूम कमर काजमी की कयादत मे कांग्रेस से पार्टी का समझौता हुआ था जिस समझौते मे लोकदल भी रही और मुस्लिम मजलिस के हिस्से मे 5 सीट से कांग्रेस के निशान से जनाब नदीम सिद्दीकी भी उम्मीदवार रहे। लेकिन कांग्रेस से मुसलमानो की बेपनहा नाराजगी के सबब कांग्रेस व लोकदल और मुस्लिम मजलिस का कोई भी उम्मीदवार कामयाब नहीं हो सका था। 1999 के इलेक्शन मे मुस्लिम मजलिस ने उम्मीदवार नही उतारा या बाद मे हुऐ असेम्बली इलेक्शन मे समाजवादी पार्टी के समझौते मे आजमगढ़ की निजामाबाद सीट जो मुस्लिम मजलिस की पुरानी सीट मिली थी। जिस पर पार्टी ने साबिक रियासती सदर आलम वदी आजम को उम्मीदवार बनाया गया था जो कामयाब हुए थे। लेकिन उसके बाद इलेक्शन मे आलम वदी साहब ने समाजवादी पार्टी मे समूलियत इख्तयार कर ली। 1998 मे रियासती सदर कमर आजमी की बीमारी की वजह से मुस्लिम मजलिस की कार करदगी कुछ वक्त के लिए रूक गयी। इसके बाद 2009 के पार्लियामेन्ट के इलेक्शन मे बिना इत्तेहाद मुस्लिम मजलिस ने रियासती सदर युसुफ हवीव की क्यादत मे आंवला लोक सभा से वसी अहमद एड० व लखनऊ लोक सभा से प्रोफेसर खाँन आतिफ को उतारा लेकिन कामयाबी हासिल नही हुई।
इसके बाद 2014 मे पार्लियामेन्ट इलेक्शन मे मुस्लिम मजलिस ने कुछ मुतालवात के साथ समाजवादी पार्टी की हिमायत की 2015 के रियासती इलेक्शन मे दिल्ली मे आप पार्टी की हिमायत की जिसकी अपील इंकलाब उर्दू मे 07/02/2015 को छपी थी। जिसमे आप को जबरदस्त बहुमत मिला। इसके बाद 2017 के रियासती चुनाव मे उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी से समझौता किया व उत्तराखण्ड मे अपने 12 उम्मीदवार उतारे और चुनाव से कब्ल कांग्रेस से मुसलमानो के बुनियादी मसाइल पर समझौता करके अपने उम्मीदवार हटा लिये थे, लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस को कामयाबी हासिल नही हुई।
खालिद साबिर साहब ने 2004 मे मुस्लिम मजलिस की जिम्मेदारी सम्भालते हुऐ 2004 मे पार्लियामेन्ट के चुनाव कांग्रेस की हिमायत
की। 2005 शाही इमाम की क्यादत मे छोटे दलो व मुस्लिम मजलिस से U.D.F का क्याम किया, जो कामयाब नही हो सका। मौलाना की सरपरस्ती मे कायम हुए यूनाईटेड फरन्ट मे मौलाना सलमान नदवी साहब की सरपरस्ती मे कायम फरन्ट मे शामिल रहकर असेम्बली मे अपने उम्मीदवार उतारे थे। लेकिन कोई कामयाब नही हो सका। सब का असेम्बली इलेक्शन मे पार्टी के फैसला के मुताबिक समाजवादी पार्टी की हिमायत कर दी गई। इस तरह मुस्लिम मजलिस इलेक्शन मे बराबर जोर आजमाइश करती रही ।
ऑल इण्डिया मुस्लिम मजलिस की तहरीकातः-
ऑल इण्डिया मुस्लिम मजलिस का क्याम ही तहरीक से अमल मे आया। बल्कि अगर यह कहा जाये कि मुस्लिम मजलिस सियासी जमाअत के साथ ही एक तहरीक का नाम है तो गलत न होगा। कायदे मिल्लत मरहूम डा० फरीदी साहब ने उर्दू को रियासत की दूसरी सरकारी जुबान बनाने, अकलियत कमीशन कायम करने व उर्दू एकेडमी की तशकील अलीगढ़ के अकलियती किरदार की बहाली की जो तहरीके चलाई। उसमे दलित, पिछड़े तबकात के लीडरो को साथ लेकर चलाई अलीगढ़ तहरीक के तहत कायदे मिल्लत की कयादत मे जेल भरो, आन्दोलन मे कई गैर मुस्लिम लीडरान शामिल रहे। खासतौर से दलित लीडर छेदी लाल साथी, सोशलिस्ट लीडर राज नारायन काबिले जिक्र है। जिन्होने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया डाक्टर फरीदी साहब को जेल से रिहा होने के लिए शासन, प्रशासन के लोग खुशामद करते रहे, लेकिन डा० फरीदी साहब उन्हे यही जबाब देते रहे कि सभी कारकनो के साथ ही वह जेल की मुश्कलात का मुकाबला करते रहेगें, यहाँ तक कि घर से गये खाने व पंखा को भी यह कहकर वापिस कर दिया था कि हमारे साथी बगैर पंखा के रहे और हम पंखा मे ऐसा नही हो सकता। जब सभी कारकुनो को रिहा किया गया तब ही डा० फरीदी साहब जेल से निकलने को तैयार हुए। जब अलीगढ़ मे पुलिस एक्शन तहत तुलवा पर जुल्म वरवरियत का पहाड़ तोड़ा गया तो डा० फरीदी साहब जो वैरूनी मुल्क के दौर पर थे दौरा मंसूख करके और तुल्वा को समझाया कि तुम लोग सिर्फ अपनी तालीम पर ध्यान दो। सरकार के जुल्म के खिलाफ लड़ना हमारा काम है। जिस पर यूनीवर्सिटी बंद करने के ऐलान को तुल्वा ने वापस ले लिया था और डा० फरीदी साहब ने बहुत ही मुजहिदाना तौर से हुकूमत के खिलाफ तहरीक चलायी थी ।
डा० फरीदी साहब ने मुस्लिम मजलिस के कारकुनान की जददो-जहद के नतीजे मे अकलियत कमीशन उर्दू एकेडमी फखरूद्दीन अली अहमद एकेडमी का क्याम अमल मे आया। डा० फरीदी साहब की वफात के बाद कारकुनान मुस्लिम मजलिस मिल्ली मसायल के हल के लिए उसी तरह तहरीक चलाते रहे। जनता पार्टी हुकूमत ही मुस्लिम मजलिस के कौमी सदर व मरकजी वजीर मो० जुल्फिकार उल्लाह साहब की कोशिश से हुकूमत अलीगढ़ के अकलियती किरदार की वहाली के लिए रजामन्द हो गई थी, लेकिन उसी दौरान जनता पार्टी की हुकूमत गिर गई 1980 मे ईद के दिन मुरादाबाद की ईदगाह मे पी०ए०सी० ने नमाजियों पर गोली चलाकर मुसलमानो का जो कत्ले आम किया उससे मुस्लिम मजलिस के कारकुनान ने पी०ए०सी० के खिलाफ जबरदस्त तहरीक चलाने का फैसला किया और आजाद हिन्दुस्तान मे पहली मर्तबा लखनऊ से दिल्ली पैदल मार्च करने का फैसला लिया गया। कौमी सदर मो० जुल्फिकार उल्लाह रियासती कार्यकारी सदर इल्यास आजमी साबिक मेम्बर पार्लियामेन्ट की क्यादत मे इस नारे के साथ कि पी०ए०सी० दंगाई है। पी०ए०सी० तोड़कर एन्टी राईट फोर्स बनाओ, जिसमे 25 फीसद सिख, 25 फीसद मुस्लिम, 25 फीसद दलित को भर्ती किया जाये। लखनऊ से दिल्ली तक पैदल मार्च करके दिल्ली पहुँचकर सदर-ए-जमहुरियाह को मैमोरण्डम पेश किया गया। इस तारीखी तहरीक मार्च मे पार्टी के सीनियर लीडर इल्यास आजमी ने जिन्दगी की आखरी सांस ले रही अपनी अहलिया को उस हालत मे छोड़कर शामिल रहे, देहली पहुँचते ही उनकी बीबी की वफात की खबर पाने पर आजमी साहब आजमगढ़ वापस गये थे। मुस्लिम मजलिस की इस तहरीक से पी०ए०सी तो नही टूटी। लेकिन इन्द्रा गाँधी जी के ईमान पर पी०ए०सी० मे मुसलमानो की तादाद मे इजाफा जरूर हुआ था। मुस्लिम मजलिस के कायदीन पी०ए०सी० तोड़कर एन्टी राईट फोर्स की तश्कील के लिए बराबर जद्दो-जहद करते रहे। जिसके नतीजे मे बी०पी० सिंह व मुलायम सिंह की हूकूमत मे शान्ति सुरक्षा बल की तश्कील हुई थी। जिसका रियासती सरबरह अहमद हसन को बनाया गया था ।
1984 मे लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क मे जुल्फिकार उल्लाह साहब की क्यादत फजलुलबारी साहब की कन्वीनरशिप मे मुस्लिम मजलिस पर 3 रोजा कांफ्रेन्स का इन्काद किया गया था। जिसकी नोटिस लेते हुए इन्द्रा जी ने मुस्लिम मजलिस के लीडरान से मसाइल पर बात करने की ख्वाहिश जाहिर की लेकिन इसी दौरान उनकी हत्या हो गई। जिसके बाद राजीव गाँधी जी वजीर आजम बने और 1984 के पार्लियामेन्ट इलेक्शन मे कांग्रेस भारी अकसरियत से कामयाब हुई। उसी दौरान सुर्पीम कोर्ट ने शाह बानो केस पर्सनल लॉ के खिलाफ फैसला कर दिया कि बोर्ड ने मुल्कगीर पैमाने पर इस मतालवा के साथ तहरीक छेड़ दी। हुकूमत मे पार्लियामेन्ट से कानून पास कराकर सुर्पीम कोर्ट के फैसले को कल अदम करार दे दिया। जिस पर मुस्लिम मजलिस जो हमेशा पर्सनल लॉ बोर्ड के फैसले की हिमायत करती रहे न सिर्फ पर्सनल ला बोर्ड की तहरीकी मे बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया बल्कि मुस्लिम मजलिस की तरफ से जुल्फिकार उल्लाह साहब, फजलुलवारी, इल्यास आजमी मो० कमर काजमी वगैरह की क्यादत मे बेगम हजरत महल पार्क लखनऊ से जबरदस्त रैली गर्वनर हाउस तक निकाल कर पर्सनल लॉ बोर्ड की हिमायत व ताईद मे मैमोरण्डम पेश किया था। यह रैली भी मिल्ली मसायल पर तारीख साज रही है और राजीव गाँधी जी ने पार्लियामेन्ट मे बिल पास कराकर कानून बना दिया था। जिसके वूमेन मुस्लिम प्रोटेक्शन ऑन डाइवोर्स एक्ट 1986 नफाज से मुस्लिम पर दफा 125 फौजदारी इतलाक कर अदब हो गया था। जिस पर संघ परिवार ने आसमान सिर पर उठा लिया तो राजीव गाँधी जी ने हिन्दुओ को खुश करने के लिए यकुम फरवरी 1986 को फैजाबाद के जिला जज के जरिये बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाकर हिन्दुओ को पूजा अर्चना की खुली छूट दिला दिया। जिस पर पूरे मुल्क मे मुसलमानो मे बैचेनी पैदा हो गयी और उसकी मुखालफत मे तहरीक चलाने के लिए बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी वजूद मे आयी। मुस्लिम मजलिस के कायदीन व कारकुनान ने इसकी न सिर्फ भरपूर हिमायत किया बल्कि खुद मुस्लिम मजलिस के प्लेटफार्म से हुकूमत के मुखालफत मे धरना, प्रदर्शन, कन्वेशन करना शुरू कर दिया और मुस्लिम मजलिस के कारकुनान ने अपनी शहादत दी, जेल गये, फिर भी कानूनी सियासी लड़ाई मे कारकुनान मुस्लिम मजलिस पेश रहे। जनाब नदीम सिद्दीकी एडवोकेट खुद यकुम फरवरी 1986 से लेकर बराबर बाबरी मस्जिद के कानूनी व सियासी लड़ाई मे भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहे। बाबरी मस्जिद की जमीन पर हाईकोर्ट के हूकूम से किये गये खुदाई मे भी नदीम सिद्दीकी एडवोकेट शामिल रहे एक्शन कमेटी के जिम्मेदारान व शहाबुद्दीन के बीच इख्तेलाफ पैदा हो गया और कमेटी दो हिस्सो मे बट गई। शहाबुद्दीन साहब की क्यादत वाली राब्ता कमेटी का मुस्लिम मजलिस ने साथ दिया और पूरे उत्तर प्रदेश मे बाबरी मस्जिद के बाज़याबी के लिए कांफ्रेस, व कान्फ्रेस इन्काद मुस्लिम मजलिस की तरफ से किया गया। इसी दौरान बाबरी मस्जिद की जमीन पर 1989 शिलन्यास किया गया तो मुस्लिम मजलिस ने इसकी जमकर मुखालफत किया और बाबरी मस्जिद की बाजयावी के लिए हर साल यकुम फरवरी 23 दिसम्बर को मुस्लिम मजलिस के कारकुनान कभी देहली कभी लखनऊ मे बराबर धरना देकर सदर जमहूरियाह को मेमोरण्डम पेश करते रहे। 1991 मे मुलायम सिंह हुकूमत के जवाल के बाद यू०पी० मे बी0जे0पी0 की कल्यान सिंह को हुकूमत कायम होने पर पूरे उ0प्र0 मे हिन्दुओ के दरमियान अफवाह का बाजार गर्म कर दिया गया कि मुसलमान अयोध्या मे राम मंदिर की तामीर विरोध कर रहे है। जिससे मुल्क के मुतादिद्द उलमा व दानिशवारान ने सदर कमर काजमी से कहा कि हिन्दुओ मे जो गलत परोप गन्डा संघ परिवार कर रहा है उसकी काट जरूरी है और मुस्लिम मजलिस को यह काम करना चाहिए। जिस पर 28 मई 1992 को देहली के मावलन्कर हाल में जुल्फिकार उल्लाह साहब की सरपरस्ती मे रियासती सदर मो0 कमर काजमी की सदारत मे मुस्लिम मजलिस का एक तारीखी कन्वेंशन मोनकिद हुआ।
जिसमे उत्तर प्रदेश मे एक माह का प्रोग्राम मुरतब करके इन्साफ कारवा (न्याय यात्रा) निकाल कर हिन्दू भाईयो के साथ मुसलमानो को भी रोशनाश करने का फैसला लिया गया और 14 सितम्बर 1992 को आलमगीर शोहरत याफता आस्ताना हजरत मखदमू समनानी की दरगाह किछौछा शरीफ से सदर कमर काजमी साहब की क्यादत से जनाब नदीम सिद्दीकी एड0 की कनवीनरशिप मे कारवां इंसाफ का आगाज किया गया जो रियासत के 42 जिलो के मुखतलिफ मुकामात होता हुआ 15 अक्टूबर को अयोध्या मे बाबरी मस्जिद से एक फरलांग की दूरी पर वाक्य मदरसा मोहल्ला कजियाना मे मुस्लिम मजलिस के कारकुनान की गिरफ्तारी पर इखतमाम पंजीर हुआ था। कारवां का मुसलमानो के आलावा हिन्दू इलाको मे भी जबरदस्त इस्तकबाल किया गया, क्योंकि कायदीन मुस्लिम मजलिस मे अपनी तकरीरो मे कहते रहे कि मुसलमान अयोध्या मे राम मंदिर के कतई मुखालिफ नही है। बल्कि मुसलमान चाहते है कि राम मंदिर राम चंद्र मर्यादा के मुताबिक तामीर हो, उनकी मर्यादा इस बात की कतई इजाजत नही देती कि मुसलमानो की सैकड़ो साला कदीमी मस्जिद जिसमे 22/23 दिसम्बर 1949 की रात मे मूर्ती रख दी गई हो। उस पर मंदिर बनायी जाए। हमारा मुतालवा कि हमारी मस्जिद को खाली करके मस्जिद से मिली हुई कई एकड़ जमीन पर राम जी का आलीशान मंदिर तामीर हो। इसके बाद 26 नवम्बर 1992 को लखनऊ के दयानिधीन पार्क मे कमर काजमी साहब ने एक रैली करने का ऐलान करते हुए कहा क्योकि संघपरिवार ने 6 दिसम्बर को अयोध्या मे भीड़ इक्टठा करने का ऐलान कर दिया है। इसलिए इस रैली में मस्जिद की हिफाजत के लिए फैसला किया जायेगा। इसी बीच नरसिंहमा राव ने बाबरी मस्जिद के तहफ्फुज का यकीन दिलाते हुए पहली मर्तबा आर०ए०एफ० के गठन का ऐलान कर दिया और आडवाणी व कल्यान सिंह ने भी एन0आई0सी0 की मीटिंग मे मस्जिद की हिफाजत का वायदा किया। जिससे मुसलमान गलतफहमी के शिकार हो गये और मुस्लिम मजलिस की रैली मे शिरकत से मुसलमानो को मुस्लिम लीडरान ही मना करने लगे तो रैली का इन्काद तो हुआ, लेकिन मस्जिद की हिफाजत के लिए नहीं किया जा सका। लेकिन जब अयोध्या मे दहशत गर्द जमा होने लगे और गवाँ को प्रमाथिने लगा और पूर्वो 13
रियासती हुकूमत आर०ए०एफ० ने कार सेवको पर लाठी गोली चलाने से मना कर दिया तो यकीन होने लगा कि बाबरी मस्जिद का अब बचना मुश्किल है और 3 दिसम्बर नदीम सिद्दीकी साहब को फैजाबाद से और कमर काजमी साहब देवबन्द से देहली पहुँच कर देहली मे मौजूद मजहबी रहनुमाऔ सियासी अकाबरीन व समूल सैय्यद शाहबुद्दीन साहब, सुल्तान सलाहउद्दीन उवैसी, अहदम बुखारी, सुलेमान सेठ साहवान व अमीरे जमाअत वगैराह को 5 दिसम्बर को उवैसी साहब के सरकारी बंगले पर इकट्ठा करके अयोध्या के ताजातरीन हालात से रोशनास कराया गया और नदीम सिद्दीकी साहब ने कहा कि आप तमामी हजरात वजीर आजम के रिहायशी गाह पर धरना रखने का मुतालवा करे कि अयोध्या को मरकजी हुकूमत अपने तहवील मे ले लें, लेकिन इस पर अकाबरीन मिल्लत यह कहने को तैयार नही हुए और कहने लगे कल्यान सिंह आडवाणी और मरकजी हुकूमत ने मस्जिद की हिफाजत की यकीन दी है, लेकिन जब 6 दिसम्बर 1992 को हमारी आँखो के सामने बाबरी मस्जिद को दहशत गरदान ने शहीद कर दिया। मरकजी आर०ए०एफ० तमाशाई बनी रही तो नरसिंहमा राव ने फिर मुसलमानो को धोखा देने के लिए इसकी जगह मस्जिद के तामीर नौ का ऐलान कर दिया। हांलाकि रियासत की हुकूमत वरख्वास्त करने के बाद 36 घन्टा तक शहीद मस्जिद की जगह आरजी मन्दिर तामीर कराने के बाद ही मस्जिद की जगह को मरकज ने अपनी तहवील मे लिया। जिससे साफ हो गया कि मस्जिद की शहादत व आरजी मन्दिर की तामीर खुद नरसिंहमा राव के प्लानिंग की हिस्सा थी। तब से हर साल 6 दिसम्बर को मुस्लिम मजलिस बाबरी मस्जिद की तामीर नौ के मुतालबा को लेकर और शहादत के खातमी मुलजिमीन को सजा दिलाने का मुतालबा करते हुए धरना करती चली आ रही है। मेरठ मलयाना से मुस्लिम नौजवानो को पी०ए०सी० ने ट्रक में भरकर हिंडन नहर मे कत्ल करके फेंक दिया तो मुस्लिम मजलिस ने पूरी रियासत मे इस दर्दनाक व काबिले मजम्मत वाक्य के खिलाफ धरना मुजाहिरा किया था और खाकी पी०ए०सी० वालो को सख्त सजा दिलाने का मुतालवा करते हुए देहली मे वोट कलब पर फजलुल वारी साहब की ज्यादत मे कारकुनान मुस्लिम मजलिस ने कफन पहनकर मुजाहिरा करके, 14
हिन्दुस्तान सदरे जमूरियाह को मैमोरेण्डम पेश किया था। इस तरह फजलुल वारी साहब के बाद कमर काजमी साहब की दौरे सदारत मे मुस्लिम मजलिस के हल के लिए तारीख साजा रोल कारकुनान मुस्लिम मजलिस ने अदा किया था, लेकिन बदकिस्मती से काजमी साहब काफी अलील रहने लगे और कौमी सदर जुल्फिकार उल्लाह साहब काफी अलील रहने लगे और कौमी सदर जुल्फिकार उल्लाह साहब की वफात हो गई तो अलहाज मो० समीउल्लाह को पार्टी का कौमी सदर और खालिद साबिर साहब को रियासती सदर मुन्तखिब किया गया। इन लोगो की कोशिश मे शाही इमाम सैय्यद अहमद बुखारी की सरपरस्ती मे यूनाईटेड फ्रन्ट की जिम्मेदारी तशकील हुई थी। फ्रन्ट का रियासती पार्टी के सीनियर लीडर महबूब अहमद साहब को बनाया गया था, लेकिन फरन्ट असेम्बली के इलेक्शन के बाद ही बिखर गया। 2007 मे इलाहाबाद के सीनियर वकील और मुस्लिम मजलिस के बुजुर्ग लीडर मजरूल इस्लाम साहब मजलिस के कौमी सदर और लखनऊ यूनीवर्सिटी मे शुअबा फारसी के प्रोफेसर साथी एम०एल०ए० डा० खान मोहम्मद आतिफ को रियासती सदर मुन्तखिब किया गया। दोनो हजरात की क्यादत मे लखनऊ के गाँधी भवन मे एक बड़ा कन्वेशन करके वैक वर्ड मे मुस्लिम बिरादरी के लिए 08.4 फीसद कोटा अलग करने का मुतालबा करते हुए कई मुतालिबात हुकूमत से किया गया था और खान आतिफ साहब अपने आमला के साथियो के साथ कई जिला का दौरा किया और हर मिल्ली मसाइल पर आवाज बुलन्द करते रहे। 2011 मे हुए इन्तखाब मे पार्टी के साविक सदर व साविक एम०एल०ए० मरहूम हबीब अहमद साहब के फरजन्द मो० युसुफ हबीब साहब रियासती सदर और मन्जर इस्लाम साहब दोबारा कौमी सदर मुन्तखिब हुए। युसुफ साहब ने भी आमला के साथियो के हमराह जिलो का दौरा किया और पार्टी मे कई सियासी हजरात को शामिल करने की कोशिश की, लेकिन इसी दौरान मुस्लिम मजलिस के जिम्मेदारान के बीच कुछ गलतफहमी के बिना पर इख्तलाफ हो गया तो अकसरियत ने युसुफ साहब को सदर मानने से इंकार कर दिया और कौसिल का इजलास मोनकिद करके प्रोफेसर अखलाक अहमद साहब को रियासती मुस्लिम मजलिस का सदर मुन्तखिब कर लिया। जो आरजी तौर पर उस जिम्मेदारी को निभाने को तैयार हुए लेकिन मुलाजमत की वजह से ज्यादा वक्त नही दे पा रहे थे। नवम्बर 2013 कौसिल ने (मो० नदीम सिद्दीकी एड रियासती सदर) और वसी अहमद एड० को वर्किंग सदर मुताखिब किया। मुनताखिब होने के फौरन बाद 6 दिसम्बर 2013 लखनऊ मे बाबरी मस्जिद की शहादत की वरसी पर ऐलामती धरना देने के बाद उसी दिन शाम को आर्टिकिल 341 के तहत मुस्लिम, ईसाई, पसमान्दा, बिरादरी को भी एस०सी०/एस०टी० की लिस्ट मे शामिल किये जाने की मांग को लेकर लखनऊ से देहली तक एक कारवां निकाला गया। जो उन्नाव, कानपुर, हरदोई, सीतापुर, शाहजहाँपुर, बरेली, रामपुर, मुरादाबाद, मेरठ, हापुड़ और गाजियाबाद होते हुए मुकर्रर जगहो पर जलसा व प्रेस कांफ्रेस कर आवाम को हुकूमत की इस ना इन्साफी से वाकिफ कराते हुए दस दिन बाद देहली जंतर-मंतर पर पहुँच कर एक धरना दिया गया और सदर जमूरिहा को मैमोरेण्डम पेश किया गया। 2014 व 2015 मे देहली व उसके बाद मुतालबा को लेकर बराबर धरना देकर सदरे जमूरियाह को मैमोरेण्डम हर साल दिया जाता रहा है। बाबरी मस्जिद की शहादत की वरसी पर 6 दिसम्बर को मुस्लिम मजलिस के रियासती दफ्तर कैसर बाग से बाबरी मस्जिद की वाजयावी व मस्जिद की शहादत के मुलजमीन को सख्त सजा देने का मुतालवा करते हुए गर्वनर हाउस तक मार्च किया जाता रहा। मो० नदीम सिद्दीकी एड0 की सरपरस्ती मे कारकुनान अगस्त 2016 रविन्दरालय हाल मे मुस्लिम मजलिस लखनऊ आर०एस०एस० के इन्द्रेश कुमार की क्यादत मे तशकील राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के जरिये किये गये उलमा कांन्फ्रेस मे इन्द्रेश कुमार की तकरीर के दौरान पार्टी के जनरल सिक्रेटरी मो० इरफान कादरी की क्यादत मे काले झण्डे दिखाते हुए इन्द्रेश को तकरीर नही करने दिया। इसके बाद यह मुस्लिम मजलिस के कारकुनान का जिगराह था कि मुस्लिम मजलिस की तरफ से लखनऊ समेत मण्डल व जिला सतह पर भगवा दहशत गरदी के खिलाफ कई इजलास प्रेस कांफ्रेस की गई। हालाकि संघ के लोगो ने मुस्लिम मजलिस के जिम्मेदारान को बराबर धमकी देते रहे कि आप भगवा हटा कर सिर्फ दहशत गर्दी मुखालिफ एहतजाज करे तो ठीक है। मुस्लिम मजलिस 16
का इस बात पर तर्क था कि संघ परिवार मुस्लिम दहशत गर्द लिखना बन्द कर दे तो हम भी भगवा दहशत गर्द लिखना बन्द कर देगे तो इंसाफ हुकूमत के जिम्मेदारान ने कहा कि अंजाम बुरा होगा। लेकिन कारकुनान मुस्लिम मजलिस की हिम्मत व हौसला मे कोई कमी नही आई और मुसलमानो के हर मसाइल पर कारकुनान मुस्लिम मजलिस अपने महदूद वसाइल के बावजूद हमेशा बराबर आवाज बुलन्द करते चले आ रहे है। मरकजी हुकूमत के जरिये 3 तलाक बिल और आर्टिकल 370 को कश्मीर से खत्म करने के खिलाफ 01/10/2019 को जन्तर-मन्तर पर दिल्ली मे मुस्लिम मजलिस ने धरना मुनकिद्ध किया। एहतजाज मे भी बढ़कर हिस्सा लिया और सुप्रीम कोर्ट मे मुस्लिम मजलिस की जानिब से भी रिट दाखिल की गई।
कोरोना जैसी बवा के दौरान तबलीगी जमाअत को लेकर मरकजी हुकूमत अपनी ना कामयाबियो पर परदा डालने के लिए हिन्दू-मुस्लिम नफरत फैलाने का अपनी मोदी मीडिया के जरिये जो घिनौना खेल खेला उसकी भी मुस्लिम मजलिस के कौमी व रियासती सदर और कौमी जनरल सिक्रेटरी पुरजोर मुखालफत करते हुए तबलीगी जमाअत का साथ दिया और मुस्लिम मजलिस के जिम्मेदारान लॉकडाउन के दौरान मिल्लत के उलमा का हर तरह से साथ देते हए पूरी कौम की भरपूर रहनुमाई किया और फसाद को अमित शाह की मुसलमानो को सबक सिखाने के लिए एक साजिश के तहत देहली के फसाद के नाम पर इकतरफा मुसलमान को जानी-माली नुकसान पहुँचाने का इल्जाम आइद करते हुए देहली के वजीर आला के रोल को भी मुस्लिम मुखालिफ बताते हुए कारकुनान मुस्लिम मजलिस ने जबरदस्त अहतजाज किया था। इस तरह मुस्लिम मजलिस, अपने क्याम से आज तक मिल्ली व समाजी मसाइल के हल करने के लिए बराबर कोषा रही है। कम वसाइल व कारकुनान की कमी के बावजूद मुस्लिम मजलिस ने कभी हिम्मत नही हारी और इस उम्मीद के साथ मिल्लत के लिए एक अपना जाती मकान मुस्लिम मजलिस को बचाकर रखा है कि शायद कौम को कोई डाक्टर फरीदी मिल जाये जो अपने मिशन व आराम इकतदार हासिल करने की चाह को दर किनार करके मिल्लत की रहनुमाई करने पर आमादा हो जावे। मुस्लिम मजलिस का दायरकार न बढ़ने मे बसाइल की कमी रही है। वही पर सेकुलर कही जाने वाली जमाअतो मे शामिल मुसलमानो व मुस्लिम जमाअतो ने भी काफी मुनाफिकाना रोल अदा किया।
आप को बताते चले मुस्लिम मजलिस के क्याम के बाद कायदे मिल्लत डाक्टर फरीदी और एम०आई०एम० के सरवराह जनाब सलाहउद्दीन उवैसी व मुस्लिम लीग की क्यादत के बीच मे तय हुआ था कि हम एक दूसरे की जमाअत की मदद करेगें और जिस रियासत मे यह मुस्लिम जमाअते मौजूद है। वहाँ अपनी जमाअत कायम नही करेगे। डा० फरीदी साहब ने उवैसी साहब लीग अकायदीन के प्लेटफार्म से मुततहदा दौरा कराया था। जिससे मिल्लत मे बहुत अच्छा पैगाम गया था। मुस्लिम लीग ने 1974 मे वायदा खिलाफी करके यू०पी मे मुसलमानो को नुकसान पहुँचाया उसका खामयाजा आज तक मिल्लत के लोग भुगत रहे है। सलाहउद्दीन उवैसी साहब ता हयात अपने वायदा पर कायम रहे। लेकिन जनाब असदउद्दीन उवैसी साहब ने यू०पी० मे जमाअत कायम करते वक्त कुछ याद नही रखा। इस बात पर बहुत गौर फिक्र किया गया क्या इस वक्त भी मुस्लिम मजलिस की अहमियत व अफादियत बाकी रह गयी है तो इस नतीजा पर पहुँचा गया कि जिन हालात मे कायदे मिल्लत ने मुस्लिम मजलिस की जरूरत और अहमियत के पेशे नजर मुस्लिम मजलिस कायम किया था। आज उससे भी ज्यादा मुस्लिम मजलिस की जरूरत अहमियत के पेशे नजर मुस्लिम मजलिस कायम किया है। इस लिए कारकुनान मुस्लिम मजलिस रियासती गीर सतहपर मुस्लिम मजलिस को रीआरग्नाइज मुतहरक ने फआल बनाने का फैसला किया है और साथ ही रियासत मे फिरका ताकतो का जिनका मुस्लिम व दलित खासतौर से निशाना है। उनको शिकस्त फाश देने के लिए हम ख्याल सियासी मिल्ली समाजी जमाअतो का भरपूर साथ देने का भी फैसला किया गया है और कारकुनान मुस्लिम मजलिस नेक नियती और हौसला के साथ इस शेर पर पेशे नजर मिल्लत की आवाज उठाये चले आ रहे है और उठाते रहेंगे ।