14 Dec 2025
सामाजिक न्याय और दलित-मुस्लिम एकता पर वक्ताओं ने रखे विचार
बरेली। आज दिनांक 14 दिसंबर 2025 को गेस्ट हाउस कैथ का पेड़, सैलानी रोड, बरेली में ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस के संस्थापक एवं कायद-ए-मिल्लत स्वर्गीय डॉ. अब्दुल जलील फरीदी की जयंती के अवसर पर एक विचार-संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता महामहिम खालिक उर्फ बड्डू ने की।
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए मुस्लिम मजलिस के राष्ट्रीय अध्यक्ष वसी अहमद एडवोकेट ने कहा कि मुस्लिम मजलिस की स्थापना 03 जून 1968 को डॉ. अब्दुल जलील फरीदी द्वारा की गई थी। उस दौर में देश की राजनीतिक परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि दलित और मुस्लिम समाज अपनी आवाज़ बुलंद करने में स्वयं को असहाय महसूस करता था और चारों ओर भय व दमन का वातावरण व्याप्त था।
उन्होंने कहा कि डॉ. फरीदी ने इस भय को समाप्त करने के लिए महात्मा ज्योतिबा फुले के विचारों का हिंदी में अनुवाद कर उत्तर प्रदेश के कोने-कोने तक पहुँचाया और दलित समाज में जागरूकता लाने का ऐतिहासिक कार्य किया। इसके परिणामस्वरूप दलित-मुस्लिम समाज में राजनीतिक चेतना का विकास हुआ।
वसी अहमद एडवोकेट ने बताया कि इसी चेतना के बल पर बाराबंकी के उपचुनाव में मुस्लिम मजलिस के बैनर तले नन्हे लाल कुशवाहा को विजय दिलाकर दलित-मुस्लिम एकता की मजबूत नींव रखी गई। साथ ही पिछड़े वर्ग को प्रोत्साहित कर जयपाल सिंह कश्यप जैसे नेताओं को आगे बढ़ाया गया। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश डॉ. फरीदी के असमय निधन के कारण उनका सपना पूरी तरह साकार नहीं हो सका।
उन्होंने आगे कहा कि आज भी मुस्लिम मजलिस अल्पसंख्यकों, दलितों और पिछड़े वर्गों के हक और सम्मान की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए प्रतिबद्ध है। वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों में समाज में छुआछूत और भेदभाव जैसी कुरीतियाँ आज भी विद्यमान हैं, जिन्हें समाप्त करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि मौजूदा सरकार द्वारा अल्पसंख्यक, दलित और पिछड़े वर्गों का लगातार उत्पीड़न किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश की पुलिस व्यवस्था निरंकुश हो चुकी है, जिसके कारण मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएँ बढ़ रही हैं। अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर उनके घरों को ध्वस्त किया जाना गंभीर चिंता का विषय है।
कार्यक्रम में जिलाध्यक्ष अतीक करम इदरीसी ने कहा कि एनआरसी और सीएए जैसे कानूनों के माध्यम से अल्पसंख्यक, दलित और पिछड़े वर्गों को राजनीतिक रूप से कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि आज सरकारें राजनीतिक दलों की बजाय कॉरपोरेट ताकतों के इशारों पर चल रही हैं, जिससे देश में बेरोज़गारी और आर्थिक असमानता बढ़ रही है।
श्री रामकुमार समदर्शी ने कहा कि वर्तमान सरकार ने लोकतांत्रिक संस्थाओं पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है, जिससे आम जनता को न्याय मिलना कठिन हो गया है। चुनाव आयोग, न्यायपालिका और मीडिया की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न खड़े हो गए हैं। सरकार की नीतियों के विरुद्ध आवाज़ उठाने वालों को ईडी और सीबीआई जैसी एजेंसियों के माध्यम से डराया-धमकाया जा रहा है।
कार्यक्रम में डॉ. अनिश बेग ने कहा कि कायद-ए-मिल्लत डॉ. अब्दुल जलील फरीदी केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति के अग्रदूत थे। उन्होंने शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय को अपना हथियार बनाया। आज की पीढ़ी को चाहिए कि डॉ. फरीदी के विचारों को आत्मसात कर आपसी भाईचारे, संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए संगठित होकर संघर्ष करे। उन्होंने कहा कि जब तक समाज का अंतिम व्यक्ति न्याय से वंचित रहेगा, तब तक डॉ. फरीदी का सपना अधूरा रहेगा।
वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि मौजूदा हालात में देश को एक बड़े जन आंदोलन की आवश्यकता है, ताकि लोकतंत्र, संविधान और सामाजिक न्याय की रक्षा की जा सके।
सभा में प्रमुख रूप से कासिम कशमीरी, चंद्र सेन भारती, याकूब क़ुरैशी, मुरादाबाद से आए प्रोफेसर बी.एस. वर्मा, मजीद खाँ, ख़ान मोवीन रिज़वी, जमील अहमद (राजू), हिना एडवोकेट, बिलाल करम, डॉ. अनास बेग, डॉ. सरताज, विनोद वाल्मीकि सहित बड़ी संख्या में कार्यकर्ता एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।